पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- सर्वोच्च न्यायालय मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत बहुविवाह की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रहा है।
बहुविवाह (Polygamy)
- बहुविवाह ऐसी वैवाहिक प्रथा है, जिसमें किसी व्यक्ति के एक से अधिक विवाहित जीवनसाथी—पत्नी या पति—होते हैं।
- प्रकार:
- बहुपत्नी प्रथा (Polygyny): एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियाँ होना।
- बहुपति प्रथा (Polyandry): एक महिला के एक से अधिक पति होना।
- द्विविवाह (Bigamy): प्रथम वैध शादी के प्रभावी रहते हुए किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करना।
- भारत में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 और विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के अंतर्गत एकविवाह अनिवार्य है। हालांकि, मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत बहुविवाह निषिद्ध नहीं है।
- NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, विभिन्न धार्मिक समुदायों में बहुविवाह की प्रथा की सूचना मिली है तथा पूर्वोत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों और जनजातीय जनसंख्या वाले क्षेत्रों में इसकी व्यापकता अपेक्षाकृत अधिक पाई गई।
- बहुविवाह की सर्वाधिक व्यापकता ईसाई समुदाय में दर्ज की गई।
- दोनों प्रमुख समुदायों के लिए संबंधित आँकड़े क्रमशः ईसाइयों में 2.1% और मुसलमानों में 1.9% थे।
- केवल 1.3% हिंदू पुरुषों की एक से अधिक पत्नियाँ थीं।
बहुविवाह के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक कारण
- आर्थिक कारण: ग्रामीण अथवा कृषि-आधारित समाजों में अधिक पत्नियों का होना घरेलू तथा कृषि संबंधी कार्यों के लिए अतिरिक्त श्रम उपलब्ध कराने वाला माना जाता था।
- पितृसत्तात्मक परंपराएँ: पुरुष उत्तराधिकारी और वंश पर विशेष महत्त्व दिए जाने के कारण, यदि प्रथम पत्नी से संतान या पुत्र न हो, तो कुछ परिस्थितियों में पुरुषों को पुनर्विवाह के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
- धार्मिक एवं प्रथागत परंपराएँ: कुछ धर्मों की व्यक्तिगत विधियों तथा कुछ जनजातियों की प्रथाओं में कुछ परिस्थितियों में बहुपत्नी विवाह की अनुमति रही है।
- सामाजिक संरक्षण: कुछ पूर्व-औद्योगिक तथा संघर्ष-प्रभावित समाजों में बाद के विवाह विधवाओं अथवा असुरक्षित महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण प्रदान करने का माध्यम बन सकते थे।
बहुविवाह के विरुद्ध तर्क
- लैंगिक असमानता एवं शोषण: बहुविवाह विवाह संस्था में असमान संबंध को बढ़ावा देकर पितृसत्तात्मक प्रभुत्व को बनाए रखता है, क्योंकि पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की अनुमति होती है, जबकि महिलाओं को समान अधिकार प्राप्त नहीं होते।
- मानसिक स्वास्थ्य: सह-पत्नियों को प्रायः भावनात्मक पीड़ा, आर्थिक असुरक्षा, हाशिए पर जाने की स्थिति तथा पारिवारिक वैवाहिक कलह का सामना करना पड़ सकता है।
- आर्थिक दबाव: एक से अधिक परिवारों का भरण-पोषण करने से उपलब्ध आर्थिक संसाधनों का विभाजन हो सकता है, जिससे ऐसे वैवाहिक संबंधों से जन्मे बच्चों की देखभाल, पोषण और शिक्षा प्रभावित हो सकती है।
- संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन: आलोचकों का तर्क है कि बहुविवाह को वैध बनाए रखना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार) के विरुद्ध हो सकता है।
नियम एवं विनियम
- भारत में विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे विषय धार्मिक पहचान पर आधारित व्यक्तिगत विधियों द्वारा विनियमित होते हैं, क्योंकि पूरे देश पर लागू होने वाली समान नागरिक संहिता (UCC) वर्तमान में अस्तित्व में नहीं है।
- जनसंख्या के बहुसंख्यक हिस्से के लिए एकविवाह ही विवाह का एकमात्र कानूनी रूप है।
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955: यह अधिनियम हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों पर लागू होता है तथा द्विविवाह को प्रतिबंधित करता है। यदि हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन आने वाला कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जीवित रहते हुए पुनर्विवाह करता है, तो दूसरा विवाह अमान्य माना जाता है।
- पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936: यह अधिनियम पारसियों के लिए द्विविवाह को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है।
- भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872: यदि विवाह करने वाले दोनों में से कोई पहले से किसी अन्य व्यक्ति से विवाहित है, तो ऐसे ईसाइयों के विवाह के प्रमाणन पर यह अधिनियम रोक लगाता है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS): इसकी धारा 82 द्विविवाह को अपराध बनाती है। यदि प्रथम पत्नी या पति के जीवित रहते हुए किया गया दूसरा विवाह कानूनी रूप से अमान्य है, तो द्विविवाह के लिए सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का प्रावधान हो सकता है।
- इस नियम का अपवाद मुस्लिम व्यक्तिगत विधि है। मुस्लिम व्यक्तिगत विधि (शरीयत) अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 के अंतर्गत मुस्लिम पुरुषों को अधिकतम चार पत्नियाँ रखने की कानूनी अनुमति है।
- फलतः, मुस्लिम पुरुषों पर BNS के द्विविवाह संबंधी दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं होते, क्योंकि उनकी व्यक्तिगत विधि इस प्रथा को मान्यता देती है।
राज्यवार विनियम
- उत्तराखंड: इसकी समान नागरिक संहिता (2024) सभी निवासियों के लिए द्विविवाह को प्रतिबंधित करती है।
- असम: असम बहुविवाह निषेध विधेयक, 2025 में कठोर दंड का प्रावधान किया गया है, जिसमें सात वर्ष तक का कारावास तथा पूर्व विवाह को छिपाने की स्थिति में 10 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान शामिल है।
- जनजातीय अपवाद: असम और उत्तराखंड दोनों में अनुसूचित जनजातियों तथा कुछ संरक्षित जनजातीय क्षेत्रों को उनके प्रथागत नियमों के सम्मान में अपवाद प्रदान किए गए हैं, जिन्हें संविधान द्वारा संरक्षण प्राप्त है।
- गोवा: गोवा एक शताब्दी से अधिक समय से पुर्तगाली सिविल कोड पर आधारित समान नागरिक संहिता का पालन करता रहा है।
- हालांकि, गोवा सिविल कोड कुछ सीमित परिस्थितियों में हिंदू पुरुष को पुनर्विवाह की अनुमति देता है, जैसे कि महिला का बांझ होना अथवा पुत्र को जन्म देने में असमर्थ होना।
- हालांकि, इस प्रावधान को लगभग अप्रचलित माना जाता है और कहा जाता है कि 1910 के बाद से इसका प्रयोग नहीं हुआ है।
बहुविवाह पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण
- सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995)): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि कोई हिंदू पुरुष अपनी प्रथम शादी के वैध रहते हुए पुनर्विवाह करने के उद्देश्य से इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसा दूसरा विवाह अमान्य होगा।
- लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000): न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय को दोहराते हुए कहा कि कपटपूर्ण अथवा दिखावटी धर्मांतरण के बाद किया गया दूसरा विवाह अवैध और दंडनीय है।
- दोनों निर्णयों में इस बात पर बल दिया गया कि धर्मांतरण का उपयोग वर्तमान विवाह कानूनों से बचने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
- 2015 में: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और इसलिए संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत इसे संरक्षण प्राप्त नहीं है।
- न्यायालय ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता आस्था की रक्षा करती है, लेकिन ऐसे आचरण की नहीं जो लोक व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता के विरुद्ध हों।
स्रोत :TH
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